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चर्चित मुद्दे *डिजीफ़ेस्ट 2026* *युवाओं को मिलेगा अवसरों का वैश्विक मंच* *डिजिटल सस्टेनेबिलिटी और नवाचारों से प्रशस्त होगा अंत्योदय का मार्ग* डिजिटल नवाचारों का मूल्य उनके उत्पाद की कीमत से नहीं, समाज में उपयोगिता से निर्धारित होता है। यह संतोष का विषय है कि आज की पीढ़ी के हमारे युवा प्रणेता निवेश अर्जित करने से अधिक सेवा सृजित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं । ये सकारात्मक बदलाव विकसित राजस्थान के साथ साथ विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा। जयपुर में आयोजित हाल ही में आयोजित हुए डिजीफेस्ट में हजारों की संख्या में प्रतिभागियों का उत्साह इस बात का प्रमाण है कि 1 जुलाई 2015 को शुरू किया गया डिजिटल इंडिया अभियान अब जन आंदोलन बनकर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है। वहीं इस डिजीफेस्ट में टाई ग्लोबल समिट का समावेश यह दर्शाता है कि छोटे शहरों में हो रहे प्रयासों को भी अब वैश्विक मंच मिल रहा है। यह पहली बार है कि टाई ग्लोबल समिट किसी मेट्रो शहर के बाहर हो रहा है और इसके लिए जयपुर का चयन निःसंदेह प्रदेश के डिजिटल नवाचारों के लिए पथ प्रदर्शक साबित होगा। देश विदेश से आए हजारों सफल डिजिटल सेवाओं के संस्थापक और विशेषज्ञ इस डिजिटल उत्सव के सत्रों में अपने अनुभव साझा कर तकनीकी बारीकियों पर चर्चा की। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में डिजिटल इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में किए प्रयासों और डिजिटल नवाचारों को बढ़ावा देने की योजनाओं की जानकारी भी यहां दी गई। इसमें आर्टिफिशल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग पॉलिसी २०२६ जारी की गई । इससे यह सिद्ध होता है कि राज्य सरकार डिजिटल सेवाओं के अनंत क्षेत्र को नीति का सशक्त आधार प्रदान कर रही है। प्रदेश के युवा नवाचार प्रणेताओं के लिए यह कौशल विकास और अन्य नवाचारों से मिलने का अनूठा अवसर था। हालांकि, इस आयोजन का लाभ सिर्फ यहां आने वाले निवेश प्रस्ताव या यहां से निकलने वाले स्टार्टअप की संख्या तक सीमित नहीं है। इसकी सफलता निर्भर होगी उन लोगों से जिनकी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान इन नवाचारों से होगा। यही उपयोगिता इन नवाचारों को सार्थक बनाती है, और यही समाज और संस्थान को सस्टेनेबिलिटी देती है। यही इस डिजीफेस्ट की थीम भी थी - *आर्टिफिशल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग के युग में सस्टेनेबिलिटी।* तेजी से बदल रही दुनिया में तकनीक और नई पीढ़ी जेन-जी के साथ सामंजस्य बैठाकर समसामयिक बने रहना किसी भी नवाचार के लिए चुनौती है। असंख्य संभावनाओं के मध्य सस्टेनेबिलिटी एक यक्ष प्रश्न है, जिसके उत्तर की तलाश हमें पुनः अंत्योदय की ओर ले जाती है। अंत्योदय की विचारधारा समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को सशक्त करने पर जोर देती है….ये व्यक्ति किसी कारण से समाज के विकास की मुख्यधारा से पीछे छूट गए होते हैं….और सिर्फ धन और शक्ति ही नहीं, कई बार सूचना, प्रौद्योगिकी और प्रोत्साहन का अभाव भी व्यक्ति को पीछे छोड़ देता है… डिजिटल नवाचारों के ज़रिए इन लोगों को सशक्त बनाने और मुख्यधारा में लाने के लिए काम करने की दरकार है। किसी भी सेवा या संस्थान का मूल्य, उसकी “वैल्यू” उसके उत्पाद की कीमत से नहीं, समाज में उसकी उपयोगिता से होती है। डिजिटल नवाचार अपने में यह वैल्यू उत्पन्न करें, अपने निजी लाभ से पहले अपने से जुड़ने वालों के लाभ को प्राथमिकता दें। अंत्योदय का विचार देते हुए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था, ‘आर्थिक नीति निर्धारण और प्रगति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि समाज को इसका तत्काल कितना फायदा मिल रहा है बल्कि यह है कि यह कितना टिकाऊ है और इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुँच रहा है।’
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