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बसंत पंचमी माँ वाग्देवी का प्राकट्य उत्सव

बसंत पंचमी माँ वाग्देवी का प्राकट्य उत्सव डॉ गोरधन लाल शर्मा, आर ए एस बसंत पंचमी - एक ऐसा दिन एक ऐसा पर्व त्योहार जो जीवन में उमंग उल्लास और सौंदर्य बोध का भान कराता है । यह प्रकृति का एक नैसर्गिक उत्सव है। इस मौसम में खेतों में सरसों के पीले फूलों की बहार देखते ही बनती है । इस दिन विद्या की देवी शारदा या सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। यह उत्सव विशेष रूप से भारत, बांग्लादेश, नेपाल समेत विश्व के विभिन्न देशों में अलग अलग स्वरूपों में बड़े उल्लास से मनाया जाता है। इस दिन पीले या केसरिया वस्त्र धारण करते हैं। शास्त्रों में बसंत पंचमी या वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी और श्रीपंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। ऋतुओं का राजा है बसंत प्राचीन भारत से पूरे साल को जिन छह ऋतुओं में बाँटा जाता रहा है, उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम है। इस समय प्रकृति में फूलों की बहार आती है तो खेतों में सरसों के फूल, जौ और गेहूँ की बालियाँ, आमों के पेड़ों पर बौर और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं हैं और भंवरे भंवराने लगते हैं । आज के दिन (माघ महीने के पाँचवे दिन) बसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए त्योहार की तरह एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है, जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती हैं। बसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथानक उपनिषदों की कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है, तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रह्माजी के किये स्तुति को सुन कर भगवान विष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहां तुरंत ही प्रकट हो गयीं तब ब्रह्मा एवं विष्णुजी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया। ब्रह्माजी तथा विष्णुजी बातों को सुनने के बाद उसी क्षण आदिशक्ति दुर्गा माता के शरीर से स्वेत रंग का एक भारी तेज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा थे । अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुरनाद किया जिससे संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी "सरस्वती" कहा। इस अद्भुत प्राकट्य की ओर मुखातिब होकर आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रह्माजी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्रीविष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं के देखते - देखते वहीं अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए। माँ सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- “प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।” अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। इति